पुस्तकें

पुस्तक पढ़ने का उद्देश्य क्या है?

यदि हम लोगों को आत्म ज्ञान नहीं होगा तो हम लोग माया, मोह द्वारा प्रभावित होते हुए, अज्ञान में जगत व्यवहार करते रहेंगे।

इसके कारण हम लोग काम, क्रोध,लोभ द्वारा शिकार बनते हुए अज्ञान में ही चलते रहेंगे। लेकिन आत्म ज्ञान होने से हम लोग ज्ञान द्वारा माया का व्यवहार करते हुए मुक्त रहेंगे।

जैसे आग का धर्म है जलाना शिशु अवस्था में हम लोग आग का धर्म न जानने के कारण अपना हाथ जला लेते हैं ।

लेकिन बड़े होने पर आग का धर्म जानने के बाद उससे हम लोग बहुत प्रकार का व्यंजन बना लेते हैं। वैसे ही अज्ञान में माया का व्यवहार करने से दुःख आ जाता है। और ज्ञान में व्यवहार करने से दुःख से मुक्त रहते हैं।

मैं अर्थात स्वयं को न जानने के कारण किसी भी विषय का यथार्थ ज्ञान नहीं होता है। क्योंकि मैं के सापेक्ष में ही जीव, जगत, ईश्वर का ज्ञान होता है। नहीं तो अज्ञान में विभेद, द्वंद, दलबाजी होता रहता है। इस लिए हम लोगों का उद्देश्य यह है कि स्वयं को जानते हुए उसी आत्म ज्ञान द्वारा समस्त विषयों को समझना और व्यवहार करना।

यह करने से हम लोग अहंकार आसक्ति से मुक्त होते हुए आनन्द और शान्ति से जीवन यापन करेंगे। इसी लिए पहले मैं को जानना है। क्यूंकि मैं को न जानने से मेरा को कैसे जान पायेंगे।यही मूल बात है।

सत्य क्या है, वह कैसे है?

जिसके रहने से सब कुछ रहता है, जिसके नही रहने पर कुछ नहीं रहता है। वह सबकी अपनी चेतना ही सत्य है ।

 ईश्वर, अल्ला, गॉड, ब्रह्म, भगवान, परमात्मा, जगत, सन्यास, संसार जो भी कहें। सत्य के ही पर्यायवाची हैं। चेतना ही सब कुछ हुई। जब हम लोग सो जाते है। तब चेतना सुप्त अवस्था में रहती है।

 उस समय जीव, जगत, ईश्वर, मैं, कुछ भी नहीं रहता, फिर जब चेतना जग जाती है। तो सब प्रकट हो जाता है । इस तरह सब चेतना के ही प्रतिबिंब हैं।

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