हमारा उद्देश्य
यदि हम लोगों को आत्म ज्ञान नहीं होगा तो हम लोग माया, मोह द्वारा प्रभावित होते हुए, अज्ञान में जगत व्यवहार करते रहेंगे।
इसके कारण हम लोग काम, क्रोध,लोभ द्वारा शिकार बनते हुए अज्ञान में ही चलते रहेंगे। लेकिन आत्म ज्ञान होने से हम लोग ज्ञान द्वारा माया का व्यवहार करते हुए मुक्त रहेंगे।
जैसे आग का धर्म है जलाना शिशु अवस्था में हम लोग आग का धर्म न जानने के कारण अपना हाथ जला लेते हैं ।
लेकिन बड़े होने पर आग का धर्म जानने के बाद उससे हम लोग बहुत प्रकार का व्यंजन बना लेते हैं। वैसे ही अज्ञान में माया का व्यवहार करने से दुःख आ जाता है। और ज्ञान में व्यवहार करने से दुःख से मुक्त रहते हैं।
मैं अर्थात स्वयं को न जानने के कारण किसी भी विषय का यथार्थ ज्ञान नहीं होता है। क्योंकि मैं के सापेक्ष में ही जीव, जगत, ईश्वर का ज्ञान होता है। नहीं तो अज्ञान में विभेद, द्वंद, दलबाजी होता रहता है। इस लिए हम लोगों का उद्देश्य यह है कि स्वयं को जानते हुए उसी आत्म ज्ञान द्वारा समस्त विषयों को समझना और व्यवहार करना।
यह करने से हम लोग अहंकार आसक्ति से मुक्त होते हुए आनन्द और शान्ति से जीवन यापन करेंगे। इसी लिए पहले मैं को जानना है। क्यूंकि मैं को न जानने से मेरा को कैसे जान पायेंगे।यही मूल बात है।
हरि ॐ
आइए और प्राप्त कीजिए आत्मज्ञान का यह अनूठा अनुभव
सत्य क्या है, वह कैसे है?
जिसके रहने से सब कुछ रहता है, जिसके नही रहने पर कुछ नहीं रहता है। वह सबकी अपनी चेतना ही सत्य है । ईश्वर, अल्ला, गॉड, ब्रह्म, भगवान, परमात्मा, जगत, सन्यास, संसार जो भी कहें। सत्य के ही पर्यायवाची हैं। चेतना ही सब कुछ हुई। जब हम लोग सो जाते है। तब चेतना सुप्त अवस्था में रहती है। उस समय जीव, जगत, ईश्वर, मैं, कुछ भी नहीं रहता, फिर जब चेतना जग जाती है। तो सब प्रकट हो जाता है । इस तरह सब चेतना के ही प्रतिबिंब हैं। चेतना के अवस्थान के अनुसार जगत, जीव और ईश्वर है । इसीलिए चेतना के अवस्थान को जानना चाहिए। एक चेतना ही अपने परिमाण व अवस्थान के अनुसार अलग–अलग परिचित होती है। लेकिन चेतना के बिना कुछ भी नहीं रहता, चेतना कोई पांडित्य का विषय नहीं है । वह अनुभव का विषय है। मनुष्य अपनी चेतना से विस्मृत होते हुए सीमित इन्द्रिय ज्ञान द्वारा भगवान के नाम पर संसार में भटकते रहते हैं। इसी कारण सत्य ईश्वर को लेकर इतने मत तैयार है। इसीलिए पहले सत्य का सिद्धान्त ठीक होना चाहिए। नही तो मतभेद होते रहेंगे। जिसके बिना किसी का भी अस्तित्व नहीं है। उस चेतना को छोड़कर और कौन ईश्वर हो सकता है जो ईश्वर को नही मानता है। यह कहने के लिए भी पहले चेतना की ही आवश्यकता है। बिना सेंस के साइंस कभी नहीं हो सकता। इसीलिए सेंस के साइंस को जानना ही सत्य का विज्ञान मार्ग है। मार्ग बहुत हो सकते हैं। लेकिन हम एक मत, पंथ मे होने के कारण सांप्रदायिक बन जाते हैं और सत्य का अनुभव नहीं कर पाते हैं। नाव में पकड़ने का उद्देश्य नदी के उस पार जाना होता है। न कि नाव में बैठे रहना। आगे पांडित्य नहीं अनुभव की जानकारी लेते रहिए ।
जीव, जगत, ईश्वर, एक ही सत्ता है
अवस्थान अलग अलग है।
चेतना के ही तीन अवस्थान, जगत, जीव और ईश्वर हैं । चेतना का अतिचेतन अवस्थान ईश्वर है। चेतना का अवचेतन अवस्थान जीव है। चेतना का अचेतन अवस्थान जड जगत है । जैसे एक ही मनुष्य के दो अवस्थान निद्रा और जागरण है। इस दो अवस्थान में तीन अवस्था – जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति है। चेतना की जाग्रत अवस्था ईश्वर है । चेतना की स्वप्न अवस्था जीव है | चेतना की सुषुप्ति अवस्था जड़ या सुप्त अवस्था है। चेतना का पूर्ण जाग्रत अवस्थान ही ईश्वर है। चेतना का आंशिक जाग्रत अवस्थान जीव और चेतना का सुप्त अवस्थान जड़ जगत है अर्थात चेतना के परिमाण भेद से ही जीव, जगत और ईश्वर है ।
ईश्वर - प्राप्ति का विषय नहीं है?
ईश्वर प्राप्ति का विषय नहीं है। अपितु जानने अर्थात अनुभव करने का विषय है। ईश्वर हमारे अन्दर ही सर्वदा चेतन के रूप में रहते हैं। बिना अनुभव के वह चेतना विस्मृत रहती हैं। गुरु इसकी स्मृति अर्थात अनुभव कराते हैं। अपनी मुक्त जाग्रत चेतना ही ईश्वर है । जो नश्वर नहीं है । वही ईश्वर है । चेतना के नहीं रहने से सब कुछ नश्वर हो जाता है । इसीलिए चेतना का ही नाम ईश्वर है । जो अनुभव का विषय है। अनुभव होने के बाद उसमें सदैव स्थित रहना ही साधना है। नही तो ईश्वर के नाम पर मन सदैव भटकता ही रह जायेगा ।
जीव, जगत, ईश्वर में भिन्नता क्या है ?
सच्चिदानन्द को ही ईश्वर कहा जाता है अर्थात सत् चित, आनन्द की सम्मिलित अवस्था ही सच्चिदानन्द है। इस प्रकार ईश्वर पूर्ण रूपेण सत्, चित, आनन्द है। जीव में सत्, चित् है, आनन्द नहीं है। यही कारण है कि जीव आनन्द अथवा सुख के लिए भटकता रहता हैं। आनन्द नहीं रहने के कारण चेतना या चित् का अवस्थान अवचेतन में चला जाता है। इसी कारण जीव अज्ञान में रहते हैं। जड़ जगत में सत् है । लेकिन चित् आनन्द नहीं है। इसी कारण वह जड़ है। हर जड में शक्ति / चेतना सुप्त है । वही सत्ता रूप से विराजमान है। जैसे निंद्रा में चेतना व आनन्द का अनुभव नहीं रहता है। लेकिन सत्ता रूप से “मै” (चेतन) के होने का भाव रहता है। इसी कारण जगत, जीव, ईश्वर में भिन्नता दृष्टिगोचर होती हैं ।
स्वयं को जानें बिना ईश्वर को नहीं जाना जा सकता है।
ईश्वर सर्वव्यापी होते हुए भी चेतना रूप में हम लोगों के अन्दर विद्यमान हैं। चेतना रहेगी। तभी ईश्वर की खोज होगी। स्वयं की चेतना ही ईश्वर है । यह न जानने के कारण ही हम लोग ईश्वर के नाम पर भटकते रहते हैं। हमारे अन्दर चेतना है । तभी हमारी आँख दृश्य को देखती है। लेकिन आँख स्वयं कभी भी उस चेतना को नहीं देख पाती । मनुष्य जैसा रंगीन चश्मा लगाता हैं । वैसे ही उन्हे जगत दिखता है। हम अपनी चेतना के ऊपर मन, बुद्धि, स्वभाव, संस्कार आदि के आवरण बनाकर रूढ़िवादी बन जाते हैं। | इसीलिए ‘स्व‘ को अर्थात चेतना को अनुभव करते हुए सब कुछ करना और समझना है । अपना अस्तित्व ही चेतना है। जिसका नाम ईश्वर है ।
ईश्वर हमसे दूर नहीं हैं?
ईश्वर हम से दूर नहीं हैं। वह सदैव हमारी चेतना के अनुभव के रूप में हमारे साथ है। लेकिन चेतना को न अनुभव कर हमारा मन, बुद्धि विक्षिप्त हैं। हमारे मन, बुद्धि चेतन को अन्दर में न अनुभव कर बाहर में ढूंढते हैं। इसीलिए हम लोग ईश्वर को अपने से अलग आकाश, मन्दिर, मस्जिद, गिरिजाघर में ढूंढते हैं । ईश्वर का वास्तविक मार्ग अपनी दृष्टि को अन्दर चेतन द्रष्टा पर ठहराना है। ताकि वह अन्दर से सर्वव्यापी होने की ओर बढ़े। इसके लिये अपनी दृष्टि को अन्दर में मोड़ना ही होगा। ईश्वर कोई जड़ मूर्ति नहीं है। वह सर्वव्यापी चेतना है । जो सबके अन्दर चेतना रूप से स्थित है। प्रत्येक साधना का उद्देश्य अन्दर में चेतना को जाग्रत करना है। ताकि हम अनुभव कर सके कि ईश्वर हमसे दूर नहीं है । यदि हम इसको समझ नहीं पाते हैं । तो जिंदगी भर भटकते रहेंगे।
ईश्वर साकार निराकार दोनों ही है, कैसे?
जैसे एक ही मनुष्य जब सो जाता है तो निराकार और जाग जाता है। तो साकार बन जाता है। जैसे एक ही सत्ता वाष्प और बर्फ बन जाता है। उसी तरह ईश्वर चेतना साकार और निराकार दोनों ही है। प्रत्येक व्यक्ति की मुक्त चेतना ही ईश्वर है। वही चेतना शरीर मेंसाकार और शरीर छोडकर निराकार हैं । सर्वव्यापी जो चेतना है, वही ईश्वर है । सर्वव्यापी होने के कारण वही सब
। कुछ है। इस तरह ईश्वर साकार और निराकार दोनों ही हैं। जैसे सोना से बहुत प्रकार के गहने बनते हैं । फिर भी वह सब गहना सोना ही है । ईश्वर को पाने के लिए साकार – निराकार अथवा
। सगुण–निर्गुण दो मार्ग है। जिसको जैसी चाहत है। वह उसी मार्ग से ईश्वर चेतना को प्राप्त करता है ।
सत्य एक है तो इतना मतभेद क्यों ?
इस तरह ईश्वर साकार और निराकार दोनों ही हैं। जैसे सोना से बहुत प्रकार के गहने बनते हैं । फिर भी वह सब गहना सोना ही है । ईश्वर को पाने के लिए साकार – निराकार अथवा । सगुण–निर्गुण दो मार्ग है। जिसको जैसी चाहत है। वह उसी मार्ग से ईश्वर चेतना को प्राप्त करता है ।
जैसे एक ही सोना से बहुत प्रकार के गहने बनते है। उसी प्रकार एक ही सत्य विश्वरूप हुआ है । सत्य को न जानने से इस संसार का समाधान नहीं हो पायेगा । सत्य के अनुभव का नाम सच्चिदानन्द है। सच्चिदानन्द शब्द को तोड़ने से सत, चित, आनन्द शब्द निकलते हैं। योगी लोग सत् को चाहते हैं । ज्ञानी लोग चित् को चाहते हैं तथा भक्त लोग आनन्द को चाहते हैं। इनकी अलग–अलग रुचि, सोच और अनुभव से मतभेद आता है मार्ग में जाने के अग्रगति के अवस्थान के अनुसार एवं सत्य को अपने दृ ष्टिकोण से अनुभव करने के कारण द्वैत, द्वैताद्वैत, अद्वैत दृष्टिकोण बनते हैं। लेकिन जो पूर्ण ज्ञानी, पूर्ण योगी, पूर्ण भक्त बन जाते हैं वे अद्वैत सच्चिदानन्द को समझ जाते हैं। जब मन स्थिर हो जाता है। तो कोई मतभेद नहीं रहता है।
नास्तिक क्यों नहीं ईश्वर को मानते हैं?
नास्तिक ईश्वर को जानता नही है। तो मानेगा कैसे? क्योंकि जानेगा तभी न मानेगा। न जानते हुए मानना या न मानना यह अज्ञान की बात है। क्योंकि ईश्वर इन्द्रिय ज्ञान का विषय नहीं है । हम काशी की पुस्तक पढ़ने से काशी नहीं पहुंच पाएंगे । पुस्तक पढ़कर जानना और काशी जाकर जानना दोनों में जमीन आसमान का अन्तर है। वायरस आँख से दिखाई नही देता। तो क्या वह नहीं है? हमारी आँख जिसके द्वारा देखती है। उस चेतना को हम देख नहीं पाते। हम ईश्वर को नहीं मानते हैं। यह कहने के लिए भी चेतना होनी चाहिए । विषय बद्ध चेतना जब मुक्त होगी। तभी ईश्वर का अनुभव हो पायेगा । मनुष्य स्वयं को नहीं जानते हैं। तो दूसरे ईश्वर को कैसे जानेंगे? हम ईश्वर को माने या नहीं माने। परन्तु हमारे अन्तर में जो चेतना है । वही ईश्वर है ।
विज्ञान ईश्वर को नहीं जानता है?
‘सेन्स‘ है तभी साइन्स है । सेन्स नहीं रहेगा । तो साइन्स भी नहीं रहेगी। सेन्स अर्थात चेतना को अनुभव करना ही “सेन्स का साइन्स‘ है। साइन्स को यदि सत्य को जानना है। तो “सेन्स के साइन्स” को जानना पडेगा ।
क्योंकि हम लोग जो जानते है। उसके पीछे जानने वाला रहता है। तभी हम लोग जान पाते हैं। ज्ञाता रहेगा तभी ज्ञेय रहेगा। लेकिन विज्ञान ज्ञाता को छोड़कर ज्ञेय के पीछे भाग रहा है। इसी कारण ‘ज्ञाता‘ अज्ञान में रहता है। विज्ञान की असम्पूर्णता की यही मूल कारण है। विज्ञान क्रिया के पीछे भाग रहा है। कर्ता को नही खोज रहा। जब तक कर्ता को नही जाना जायेगा। तब तक विज्ञान असम्पूर्ण ही जाएगा। विज्ञान जब तक सेंस के साइंस को नही खोजेगा । तब तक ईश्वर को नही जान पाएगा। आधुनिक विज्ञान सेंस को मान रहा है। लेकिन सेंस को जानने के लिए अपने शरीर यंत्र का उपयोग नही कर रहा है।
स्वयं को छोड़कर बाहर में ईश्वर की खोज एक भ्रम है ?
ईश्वर कोई बाहरी सत्ता नही है । यह सबकी अन्तर चेतना है । इसलिए अन्तर चेतना में जुड़ना है। मन के अस्थिर और स्थिर रहने के कारण ईश्वर है, कि नहीं है यह विचार आता है। जब मन स्थिर हो जाता है। तो वही ईश्वर चेतना है । यह अनुभव छोड़कर । जब मन दूसरे किसी विषय में भटकता है। तब वह ईश्वर के नाम पर भ्रम में रहता है। ईश्वर है कि नहीं है? यह कोई सोच / विचार नहीं है। अपितु जब मन स्थिर तथा चेतना जाग्रत हो । तभी ईश्वर का अनुभव होता है अर्थात वही ईश्वर है। जब चेतना के उपर ईश्वर के संबंध में कोई सोच आ जाती है। तो वही सोच चेतना के ऊपर आवरण बन जाती है उसी आवरण को लेकर ईश्वर से संबंधित सोच हमे बाहर भटकाती रहती हैं। जब मन स्थिर हो जाता है । तो ईश्वर और जब अस्थिर हो जाता है तो जीव। इस प्रकार ये एक ही सत्ता के दो अवस्थान है ।
एक को जानने का नाम ज्ञान और बहुत को जानने का नाम अज्ञान है ?
एक को जानने का नाम ज्ञान है और बहुत को जानने का नाम अज्ञान है? क्योंकि एक से ही सब कुछ बना है। चेतना रहेगी, तभी सब कुछ रहेगा । चेतना से चिन्ता बनती है, चिन्ता से मन, बुद्धि, अहं, आसक्ति बनते है । मन, बुद्धि, अहं, आसक्ति से इन्द्रिय जगत का व्यवहार होता है। चेतना में नहीं रहने से मन, बुद्धि, अहं, आसक्ति आदि जगत व्यवहार कुछ भी नहीं रहते हैं। जगत, शरीर, मन, बुद्धि जब “मै” (चेतना) रहता है। तभी रहते है । अन्त (मैं) चेतना ही अवशेष रहती है। इसीलिए चेतना ही ज्ञान है। वही एक चेतना मन, बुद्धि, इन्द्रिय, जगत के द्वारा बहुत कुछ बन जाती है । जैसे एक ही व्यक्ति किसी का पिता, किसी का बेटा किसी का स्वामी बन जाता है ।
एक ज्ञान कैसे बहुत ज्ञान में परिवर्तित हो जाता है? एक ज्ञान अपनी मुक्त चेतना का अनुभव है।
व्यक्ति यह नहीं जानते हैं कि उसका एक ज्ञान बहुत ज्ञान में कैसे परिवर्तित हो जाता है? एक ज्ञान है – ज्ञान का ज्ञान और बहुत ज्ञान है – ज्ञान का विषय । व्यक्ति एक ज्ञान अर्थात ज्ञान के ज्ञान को छोड़कर, व्यक्ति ज्ञान के विषय के बहुत ज्ञान में फंस जाते हैं । लेकिन सत्य को जानना है। तो बहुत ज्ञान (विषय ज्ञान) को छोड़कर अपनी स्थिति बोध (चेतना) को अनुभव करना होगा। वही स्थिति बोध अथवा एक ज्ञान भंग होकर त्रिपुटी का ज्ञान बन जाता है। जब व्यक्ति अपनी स्थिति बोध में रहते हैं । तब ज्ञान एक और अखण्ड रहता है। जब वही ज्ञान विषय में आता है। तो वह अखण्ड ज्ञान खण्डित होकर उस विषय को लेते हुए अलग से ज्ञाता, ज्ञेय और उस विषय का ज्ञान हो जाता हैं, आदि ।
ईश्वर है, इसका प्रमाण क्या है?
ईश्वर है इसका प्रमाण तुम हो। लेकिन तुम कौन हो? तुम नहीं जानते हो। जो तुम्हारे अन्दर मैं (चेतना) है। उस “मैं” को खोजोगे। तो पता चलेगा कि “मैं” शरीर, मन, बुद्धि नहीं हूँ। अन्त में जो अस्तित्व अथवा चेतना रह जाती है। वही वास्तविक (मैं) है। उसी का नाम “ईश्वर” है। सबका वास्तविक नाम “मैं” (चेतना) 1 इसीलिए सब (मैं–मैं) करते हैं। जो तुम हो उसके अंदर भी “मैं” (चेतना) है। इसीलिए तुम अपने को “मैं” कहते हो ।
पाण्डित्य से ईश्वर उपलब्ध नहीं होते है ?
वृन्दावन की पुस्तक पढ़कर वृन्दावन को जानना और वृन्दावन जाकर वृन्दावन को जानना, दोनों में जो अन्तर है, वही पाण्डित्य और ईश्वर की उपलब्धि में अन्तर है । एक परोक्ष ज्ञान है। दूसरा प्रत्यक्ष ज्ञान है। परोक्ष ज्ञान में हम कल्पना, अनुमान, तर्क लगाते है। लेकिन उपलब्धि नहीं करते हैं। अधिकांश मनुष्य ईश्वर के नाम पर पाण्डित्य में फंस जाते है । पाण्डित्य अहंकार को बढ़ाता है। हम “मैं जानता हूँ” इसी अभिमान मे फंसते हैं। लेकिन “मैं कौन हूँ?” जानना क्या है? इसकी कोई उपलब्धि नहीं है । जानने का कई क्रम स्तर जैसे कि पढ़कर जानना, करते हुए जानना, पाते हुए जानना, होते हुए जानना होता है। लेकिन हम शुरू को ही अन्तिम मान लेते हैं। इसीलिए पाण्डित्य और प्रज्ञा को समझना होगा । पाण्डित्य पढ़कर–सुनकर जानना है और ‘प्रजा‘ (स्थिर विवेक) होकर जानना है।
बोध प्राप्ति केंद्र
अनुभूति करें, सच्चे स्वरुप की
जैसे विषय के बारे में केंद्र के माध्यम से बोध प्राप्ति द्वारा इन सभी प्रश्नों का (साक्षात्कार) अनुभव कराया जाता है।