सुविचार : → आत्म ज्ञान होने से हमलोग ज्ञान द्वारा व्यवहार करते हुए मुक्त रहेंगे। → जिसके रहने से सब कुछ रहता है नहीं रहने पर कुछ नहीं रहता, वह अपनी चेतना ही है यही सत्य है? → चेतना के तीन अवस्थाएं हैं जीव, जगत व ईश्वर। चेतना का अतिचेतन अवस्था ईश्वर है, अचेतन अवस्था जीव व चेतना का अचेतन अवस्था जड़ है → ईश्वर प्राप्ति का विषय नहीं है अपितु अनुभव करने का विषय है। ईश्वर हमारे अन्दर सर्वदा चेतन के रूप में रहते हैं। → अनुभव होने के बाद सदैव स्थित रहना ही साधना है।े →अपना अस्तित्व ही चेतना है जिसका नाम ईश्वर है। →ईश्वर हमसे दूर नहीं है वह सदैव हमारी चेतना के अनुभव के रूप में हमारे साथ है।
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हमारा उद्देश्य

यदि हम लोगों को आत्म ज्ञान नहीं होगा तो हम लोग माया, मोह द्वारा प्रभावित होते हुए, अज्ञान में जगत व्यवहार करते रहेंगे।

इसके कारण हम लोग काम, क्रोध,लोभ द्वारा शिकार बनते हुए अज्ञान में ही चलते रहेंगे। लेकिन आत्म ज्ञान होने से हम लोग ज्ञान द्वारा माया का व्यवहार करते हुए मुक्त रहेंगे।

जैसे आग का धर्म है जलाना शिशु अवस्था में हम लोग आग का धर्म न जानने के कारण अपना हाथ जला लेते हैं ।

लेकिन बड़े होने पर आग का धर्म जानने के बाद उससे हम लोग बहुत प्रकार का व्यंजन बना लेते हैं। वैसे ही अज्ञान में माया का व्यवहार करने से दुःख आ जाता है। और ज्ञान में व्यवहार करने से दुःख से मुक्त रहते हैं।

मैं अर्थात स्वयं को न जानने के कारण किसी भी विषय का यथार्थ ज्ञान नहीं होता है। क्योंकि मैं के सापेक्ष में ही जीव, जगत, ईश्वर का ज्ञान होता है। नहीं तो अज्ञान में विभेद, द्वंद, दलबाजी होता रहता है। इस लिए हम लोगों का उद्देश्य यह है कि स्वयं को जानते हुए उसी आत्म ज्ञान द्वारा समस्त विषयों को समझना और व्यवहार करना।

यह करने से हम लोग अहंकार आसक्ति से मुक्त होते हुए आनन्द और शान्ति से जीवन यापन करेंगे। इसी लिए पहले मैं को जानना है। क्यूंकि मैं को न जानने से मेरा को कैसे जान पायेंगे।यही मूल बात है।

हरि ॐ

आइए और प्राप्त कीजिए आत्मज्ञान का यह अनूठा अनुभव

जिसके रहने से सब कुछ रहता है, जिसके नही रहने पर कुछ नहीं रहता हैवह सबकी अपनी चेतना ही सत्य है ईश्वर, अल्ला, गॉड, ब्रह्म, भगवान, परमात्मा, जगत, सन्यास, संसार जो भी कहेंसत्य के ही पर्यायवाची हैंचेतना ही सब कुछ हुईजब हम लोग सो जाते हैतब चेतना सुप्त अवस्था में रहती हैउस समय जीव, जगत, ईश्वर, मैं, कुछ भी नहीं रहता, फिर जब चेतना जग जाती हैतो सब प्रकट हो जाता है इस तरह सब चेतना के ही प्रतिबिंब हैंचेतना के अवस्थान के अनुसार जगत, जीव और ईश्वर है इसीलिए चेतना के अवस्थान को जानना चाहिएएक चेतना ही अपने परिमाण अवस्थान के अनुसार अलगअलग परिचित होती हैलेकिन चेतना के बिना कुछ भी नहीं रहता, चेतना कोई पांडित्य का विषय नहीं है वह अनुभव का विषय हैमनुष्य अपनी चेतना से विस्मृत होते हुए सीमित इन्द्रिय ज्ञान द्वारा भगवान के नाम पर संसार में भटकते रहते हैंइसी कारण सत्य ईश्वर को लेकर इतने मत तैयार हैइसीलिए पहले सत्य का सिद्धान्त ठीक होना चाहिएनही तो मतभेद होते रहेंगेजिसके बिना किसी का भी अस्तित्व नहीं हैउस चेतना को छोड़कर और कौन ईश्वर हो सकता है जो ईश्वर को नही मानता हैयह कहने के लिए भी पहले चेतना की ही आवश्यकता हैबिना सेंस के साइंस कभी नहीं हो सकताइसीलिए सेंस के साइंस को जानना ही सत्य का विज्ञान मार्ग हैमार्ग बहुत हो सकते हैंलेकिन हम एक मत, पंथ मे होने के कारण सांप्रदायिक बन जाते हैं और सत्य का अनुभव नहीं कर पाते हैंनाव में पकड़ने का उद्देश्य नदी के उस पार जाना होता हैकि नाव में बैठे रहनाआगे पांडित्य नहीं अनुभव की जानकारी लेते रहिए ।

अवस्थान अलग अलग है। 

चेतना के ही तीन अवस्थान, जगत, जीव और ईश्वर हैं चेतना का अतिचेतन अवस्थान ईश्वर हैचेतना का अवचेतन अवस्थान जीव हैचेतना का अचेतन अवस्थान जड जगत है जैसे एक ही मनुष्य के दो अवस्थान निद्रा और जागरण हैइस दो अवस्थान में तीन अवस्था जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति हैचेतना की जाग्रत अवस्था ईश्वर है चेतना की स्वप्न अवस्था जीव है | चेतना की सुषुप्ति अवस्था जड़ या सुप्त अवस्था हैचेतना का पूर्ण जाग्रत अवस्थान ही ईश्वर हैचेतना का आंशिक जाग्रत अवस्थान जीव और चेतना का सुप्त अवस्थान जड़ जगत है अर्थात चेतना के परिमाण भेद से ही जीव, जगत और ईश्वर है

ईश्वर प्राप्ति का विषय नहीं हैअपितु जानने अर्थात अनुभव करने का विषय हैईश्वर हमारे अन्दर ही सर्वदा चेतन के रूप में रहते हैंबिना अनुभव के वह चेतना विस्मृत रहती हैंगुरु इसकी स्मृति अर्थात अनुभव कराते हैंअपनी मुक्त जाग्रत चेतना ही ईश्वर है जो नश्वर नहीं है वही ईश्वर है चेतना के नहीं रहने से सब कुछ नश्वर हो जाता है इसीलिए चेतना का ही नाम ईश्वर है जो अनुभव का विषय हैअनुभव होने के बाद उसमें सदैव स्थित रहना ही साधना हैनही तो ईश्वर के नाम पर मन सदैव भटकता ही रह जायेगा

सच्चिदानन्द को ही ईश्वर कहा जाता है अर्थात सत् चित, आनन्द की सम्मिलित अवस्था ही सच्चिदानन्द हैइस प्रकार ईश्वर पूर्ण रूपेण सत्, चित, आनन्द हैजीव में सत्, चित् है, आनन्द नहीं हैयही कारण है कि जीव आनन्द अथवा सुख के लिए भटकता रहता हैंआनन्द नहीं रहने के कारण चेतना या चित् का अवस्थान अवचेतन में चला जाता हैइसी कारण जीव अज्ञान में रहते हैंजड़ जगत में सत् है लेकिन चित् आनन्द नहीं हैइसी कारण वह जड़ है। हर जड में शक्ति / चेतना सुप्त है वही सत्ता रूप से विराजमान हैजैसे निंद्रा में चेतना आनन्द का अनुभव नहीं रहता हैलेकिन सत्ता रूप से मै(चेतन) के होने का भाव रहता हैइसी कारण जगत, जीव, ईश्वर में भिन्नता दृष्टिगोचर होती हैं 

ईश्वर सर्वव्यापी होते हुए भी चेतना रूप में हम लोगों के अन्दर विद्यमान हैंचेतना रहेगीतभी ईश्वर की खोज होगीस्वयं की चेतना ही ईश्वर है यह न जानने के कारण ही हम लोग ईश्वर के नाम पर भटकते रहते हैंहमारे अन्दर चेतना है तभी हमारी आँख दृश्य को देखती हैलेकिन आँख स्वयं कभी भी उस चेतना को नहीं देख पाती मनुष्य जैसा रंगीन चश्मा लगाता हैं वैसे ही उन्हे जगत दिखता हैहम अपनी चेतना के ऊपर मन, बुद्धि, स्वभाव, संस्कार आदि के आवरण बनाकर रूढ़िवादी बन जाते हैं| इसीलिए स्वको अर्थात चेतना को अनुभव करते हुए सब कुछ करना और समझना है अपना अस्तित्व ही चेतना हैजिसका नाम ईश्वर है

ईश्वर हम से दूर नहीं हैंवह सदैव हमारी चेतना के अनुभव के रूप में हमारे साथ हैलेकिन चेतना को अनुभव कर हमारा मन, बुद्धि विक्षिप्त हैंहमारे मन, बुद्धि चेतन को अन्दर में अनुभव कर बाहर में ढूंढते हैंइसीलिए हम लोग ईश्वर को अपने से अलग आकाश, मन्दिर, मस्जिद, गिरिजाघर में ढूंढते हैं ईश्वर का वास्तविक मार्ग अपनी दृष्टि को अन्दर चेतन द्रष्टा पर ठहराना हैताकि वह अन्दर से सर्वव्यापी होने की ओर बढ़ेइसके लिये अपनी दृष्टि को अन्दर में मोड़ना ही होगाईश्वर कोई जड़ मूर्ति नहीं हैवह सर्वव्यापी चेतना है जो सबके अन्दर चेतना रूप से स्थित हैप्रत्येक साधना का उद्देश्य अन्दर में चेतना को जाग्रत करना हैताकि हम अनुभव कर सके कि ईश्वर हमसे दूर नहीं है यदि हम इसको समझ नहीं पाते हैं तो जिंदगी भर भटकते रहेंगे। 

जैसे एक ही मनुष्य जब सो जाता है तो निराकार और जाग जाता हैतो साकार बन जाता हैजैसे एक ही सत्ता वाष्प और बर्फ बन जाता हैउसी तरह ईश्वर चेतना साकार और निराकार दोनों ही हैप्रत्येक व्यक्ति की मुक्त चेतना ही ईश्वर हैवही चेतना शरीर मेंसाकार और शरीर छोडकर निराकार हैं सर्वव्यापी जो चेतना है, वही ईश्वर है सर्वव्यापी होने के कारण वही सब 

कुछ हैइस तरह ईश्वर साकार और निराकार दोनों ही हैंजैसे सोना से बहुत प्रकार के गहने बनते हैं फिर भी वह सब गहना सोना ही है ईश्वर को पाने के लिए साकार निराकार अथवा 

सगुणनिर्गुण दो मार्ग हैजिसको जैसी चाहत हैवह उसी मार्ग से ईश्वर चेतना को प्राप्त करता है

इस तरह ईश्वर साकार और निराकार दोनों ही हैंजैसे सोना से बहुत प्रकार के गहने बनते हैं फिर भी वह सब गहना सोना ही है ईश्वर को पाने के लिए साकार निराकार अथवा सगुणनिर्गुण दो मार्ग हैजिसको जैसी चाहत हैवह उसी मार्ग से ईश्वर चेतना को प्राप्त करता है 

जैसे एक ही सोना से बहुत प्रकार के गहने बनते हैउसी प्रकार एक ही सत्य विश्वरूप हुआ है सत्य को जानने से इस संसार का समाधान नहीं हो पायेगा सत्य के अनुभव का नाम सच्चिदानन्द हैसच्चिदानन्द शब्द को तोड़ने से सत, चित, आनन्द शब्द निकलते हैंयोगी लोग सत् को चाहते हैं ज्ञानी लोग चित् को चाहते हैं तथा भक्त लोग आनन्द को चाहते हैंइनकी अलगअलग रुचि, सोच और अनुभव से मतभेद आता है मार्ग में जाने के अग्रगति के अवस्थान के अनुसार एवं सत्य को अपने दृ ष्टिकोण से अनुभव करने के कारण द्वैत, द्वैताद्वैत, अद्वैत दृष्टिकोण बनते हैंलेकिन जो पूर्ण ज्ञानी, पूर्ण योगी, पूर्ण भक्त बन जाते हैं वे अद्वैत सच्चिदानन्द को समझ जाते हैंजब मन स्थिर हो जाता हैतो कोई मतभेद नहीं रहता है

नास्तिक ईश्वर को जानता नही हैतो मानेगा कैसे? क्योंकि जानेगा तभी मानेगाजानते हुए मानना या मानना यह अज्ञान की बात हैक्योंकि ईश्वर इन्द्रिय ज्ञान का विषय नहीं है हम काशी की पुस्तक पढ़ने से काशी नहीं पहुंच पाएंगे पुस्तक पढ़कर जानना और काशी जाकर जानना दोनों में जमीन आसमान का अन्तर हैवायरस आँख से दिखाई नही देतातो क्या वह नहीं है? हमारी आँख जिसके द्वारा देखती हैउस चेतना को हम देख नहीं पातेहम ईश्वर को नहीं मानते हैंयह कहने के लिए भी चेतना होनी चाहिए विषय बद्ध चेतना जब मुक्त होगीतभी ईश्वर का अनुभव हो पायेगा मनुष्य स्वयं को नहीं जानते हैंतो दूसरे ईश्वर को कैसे जानेंगे? हम ईश्वर को माने या नहीं मानेपरन्तु हमारे अन्तर में जो चेतना है वही ईश्वर है 

सेन्सहै तभी साइन्स है सेन्स नहीं रहेगा तो साइन्स भी नहीं रहेगीसेन्स अर्थात चेतना को अनुभव करना ही सेन्स का साइन्सहैसाइन्स को यदि सत्य को जानना हैतो सेन्स के साइन्सको जानना पडेगा । 

क्योंकि हम लोग जो जानते हैउसके पीछे जानने वाला रहता हैतभी हम लोग जान पाते हैंज्ञाता रहेगा तभी ज्ञेय रहेगालेकिन विज्ञान ज्ञाता को छोड़कर ज्ञेय के पीछे भाग रहा हैइसी कारण ज्ञाताअज्ञान में रहता हैविज्ञान की असम्पूर्णता की यही मूल कारण हैविज्ञान क्रिया के पीछे भाग रहा हैकर्ता को नही खोज रहाजब तक कर्ता को नही जाना जायेगातब तक विज्ञान असम्पूर्ण ही जाएगाविज्ञान जब तक सेंस के साइंस को नही खोजेगा तब तक ईश्वर को नही जान पाएगाआधुनिक विज्ञान सेंस को मान रहा हैलेकिन सेंस को जानने के लिए अपने शरीर यंत्र का उपयोग नही कर रहा है

ईश्वर कोई बाहरी सत्ता नही है यह सबकी अन्तर चेतना है इसलिए अन्तर चेतना में जुड़ना हैमन के अस्थिर और स्थिर रहने के कारण ईश्वर है, कि नहीं है यह विचार आता हैजब मन स्थिर हो जाता हैतो वही ईश्वर चेतना है यह अनुभव छोड़कर जब मन दूसरे किसी विषय में भटकता हैतब वह ईश्वर के नाम पर भ्रम में रहता हैईश्वर है कि नहीं है? यह कोई सोच / विचार नहीं हैअपितु जब मन स्थिर तथा चेतना जाग्रत हो । तभी ईश्वर का अनुभव होता है अर्थात वही ईश्वर हैजब चेतना के उपर ईश्वर के संबंध में कोई सोच आ जाती हैतो वही सोच चेतना के ऊपर आवरण बन जाती है उसी आवरण को लेकर ईश्वर से संबंधित सोच हमे बाहर भटकाती रहती हैंजब मन स्थिर हो जाता है तो ईश्वर और जब अस्थिर हो जाता है तो जीवइस प्रकार ये एक ही सत्ता के दो अवस्थान है । 

एक को जानने का नाम ज्ञान है और बहुत को जानने का नाम अज्ञान है? क्योंकि एक से ही सब कुछ बना हैचेतना रहेगी, तभी सब कुछ रहेगा चेतना से चिन्ता बनती है, चिन्ता से मन, बुद्धि, अहं, आसक्ति बनते है मन, बुद्धि, अहं, आसक्ति से इन्द्रिय जगत का व्यवहार होता हैचेतना में नहीं रहने से मन, बुद्धि, अहं, आसक्ति आदि जगत व्यवहार कुछ भी नहीं रहते हैंजगत, शरीर, मन, बुद्धि जब मै(चेतना) रहता हैतभी रहते है अन्त (मैं) चेतना ही अवशेष रहती हैइसीलिए चेतना ही ज्ञान हैवही एक चेतना मन, बुद्धि, इन्द्रिय, जगत के द्वारा बहुत कुछ बन जाती है जैसे एक ही व्यक्ति किसी का पिता, किसी का बेटा किसी का स्वामी बन जाता है । 

व्यक्ति यह नहीं जानते हैं कि उसका एक ज्ञान बहुत ज्ञान में कैसे परिवर्तित हो जाता है? एक ज्ञान है ज्ञान का ज्ञान और बहुत ज्ञान है ज्ञान का विषय व्यक्ति एक ज्ञान अर्थात ज्ञान के ज्ञान को छोड़कर, व्यक्ति ज्ञान के विषय के बहुत ज्ञान में फंस जाते हैं लेकिन सत्य को जानना हैतो बहुत ज्ञान (विषय ज्ञान) को छोड़कर अपनी स्थिति बोध (चेतना) को अनुभव करना होगावही स्थिति बोध अथवा एक ज्ञान भंग होकर त्रिपुटी का ज्ञान बन जाता हैजब व्यक्ति अपनी स्थिति बोध में रहते हैं तब ज्ञान एक और अखण्ड रहता हैजब वही ज्ञान विषय में आता हैतो वह अखण्ड ज्ञान खण्डित होकर उस विषय को लेते हुए अलग से ज्ञाता, ज्ञेय और उस विषय का ज्ञान हो जाता हैं, आदि । 

ईश्वर है इसका प्रमाण तुम होलेकिन तुम कौन हो? तुम नहीं जानते होजो तुम्हारे अन्दर मैं (चेतना) हैउस मैंको खोजोगेतो पता चलेगा कि मैंशरीर, मन, बुद्धि नहीं हूँअन्त में जो अस्तित्व अथवा चेतना रह जाती हैवही वास्तविक (मैं) हैउसी का नाम ईश्वरहैसबका वास्तविक नाम मैं(चेतना) 1 इसीलिए सब (मैंमैं) करते हैंजो तुम हो उसके अंदर भी मैं(चेतना) हैइसीलिए तुम अपने को मैंकहते हो । 

वृन्दावन की पुस्तक पढ़कर वृन्दावन को जानना और वृन्दावन जाकर वृन्दावन को जानना, दोनों में जो अन्तर है, वही पाण्डित्य और ईश्वर की उपलब्धि में अन्तर है एक परोक्ष ज्ञान हैदूसरा प्रत्यक्ष ज्ञान हैपरोक्ष ज्ञान में हम कल्पना, अनुमान, तर्क लगाते हैलेकिन उपलब्धि नहीं करते हैंअधिकांश मनुष्य ईश्वर के नाम पर पाण्डित्य में फंस जाते है पाण्डित्य अहंकार को बढ़ाता हैहम मैं जानता हूँइसी अभिमान मे फंसते हैंलेकिन मैं कौन हूँ?जानना क्या है? इसकी कोई उपलब्धि नहीं है जानने का कई क्रम स्तर जैसे कि पढ़कर जानना, करते हुए जानना, पाते हुए जानना, होते हुए जानना होता हैलेकिन हम शुरू को ही अन्तिम मान लेते हैंइसीलिए पाण्डित्य और प्रज्ञा को समझना होगा पाण्डित्य पढ़करसुनकर जानना है और प्रजा(स्थिर विवेक) होकर जानना है

बोध प्राप्ति केंद्र

अनुभूति करें, सच्चे स्वरुप की

 

   जैसे विषय के बारे में केंद्र के माध्यम से बोध प्राप्ति द्वारा इन सभी प्रश्नों का (साक्षात्कार) अनुभव कराया जाता है।

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